यह एक ऐसी समस्या है जिसमें आँखें एक ही समय पर बिल्कुल एक ही दिशा में नहीं देखती हैं। यह समस्या खासकर छोटे बच्चों में आम है, लेकिन किसी भी उम्र में हो सकती है। आँखों के तिरछेपन या भेंगेपन को आमतौर पर शुरुआती इलाज से ठीक किया जा सकता है। बचपन में ही आँखों के तिरछेपन का इलाज जल्द से जल्द शुरू करना ज़रूरी है।
तिरछी आँखें
पढ़ने में कठिनाई
चलते समय लड़खड़ाना
दोहरी दृष्टि
देखते समय सिर को झुकाना
खेलों में भाग लेने में हिचकिचाहट
आँखों की असंतुलित हरकतें
बार-बार सिरदर्द की शिकायत
तिरछी आँखों (स्कविंट) के कारण
भेंगापन होने का सही कारण हमेशा पता नहीं चलता। इसके कई कारण हो सकते हैं। भेंगापन के कारण ये हो सकते हैं:
जन्मजात (बच्चा तिरछी आँखों के साथ पैदा हो सकता है)
आनुवंशिक (परिवार में चलने वाली समस्या)
किसी बीमारी का नतीजा (वायरल बुखार, खसरा, मेनिन्जाइटिस आदि के कारण भी आँखें तिरछी हो सकती हैं)
रिफ्रैक्टिव एरर या एस्टिग्मैटिज्म (दृष्टि दोष)
चोट लगना
अन्य स्थितियाँ (सेरेब्रल पाल्सी और डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों वाले बच्चों में भी आँखें तिरछी होने की संभावना अधिक हो सकती है)
जोखिम
भेंगापन (squint) होने का खतरा बढ़ाने वाले कारणों में शामिल हैं:
समय से पहले जन्म
जन्म के समय बच्चे का छोटा आकार
परिवार में भेंगापन होने का इतिहास
बच्चे में विकास संबंधी अक्षमता
अगर इलाज न कराया जाए तो क्या होगा?
भेंगापन (squint) को नज़रअंदाज़ न करना ज़रूरी है। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो आगे चलकर और भी समस्याएँ हो सकती हैं:
मरीज़ को चीज़ें दो-दो दिखाई दे सकती हैं।
आंखों का तिरछापन हमेशा के लिए हो सकता है।
बच्चे की नज़र सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाएगी।
मरीज़ को शर्मिंदगी या कम आत्मविश्वास का सामना करना पड़ सकता है।
इलाज के विकल्प
बचपन में ही 'लेज़ी आई' (lazy eye) का इलाज शुरू करना ज़रूरी है।
आँख की स्थिति के आधार पर, डॉक्टर भेंगापन (squint) के इलाज के लिए आँखों की कसरत करने की सलाह दे सकते हैं।
अगर मरीज़ को रिफ्रैक्टिव एरर या एस्टिग्मैटिज़्म की वजह से भेंगापन है, तो डॉक्टर चश्मा लगाने की सलाह दे सकते हैं।
आँख की स्थिति के आधार पर डॉक्टर सर्जरी की सलाह भी दे सकते हैं।
अपनी ज़्यादा मज़बूत आँख पर आई पैच लगाने से कमज़ोर आँख को मज़बूत करने में मदद मिल सकती है। डॉक्टर मरीज़ को ज़्यादा मज़बूत आँख पर आई पैच लगाने की सलाह दे सकते हैं।
विशेष नोट
बच्चे के कम उम्र का होने पर इलाज ज़्यादा असरदार होता है। बचपन में ही 'लेज़ी आई' (lazy eye) का इलाज जल्द से जल्द शुरू करना ज़रूरी है। सबसे अच्छे नतीजे तब मिलते हैं जब इलाज 7 या 8 साल की उम्र से पहले शुरू किया जाए।
आपके बच्चे के सभी लक्षण और वे कब से दिखाई देने लगे।
आपके बच्चे द्वारा ली जाने वाली सभी दवाएं और सप्लीमेंट्स, साथ ही उनकी खुराक (डोज़)।
आपके बच्चे की आंखों से जुड़ी अन्य समस्याओं या एलर्जी के बारे में जानकारी।
आंखों की समस्याओं का आपका पारिवारिक इतिहास।
डॉक्टर से पूछने के लिए सभी सवाल।
बीमारी या स्थिति क्या है? यह बीमारी या स्थिति कितनी गंभीर है और इससे बच्चे की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा?
क्या एक से ज़्यादा ऐसी बीमारियाँ या स्थितियाँ हो सकती हैं जिनकी वजह से बच्चे में ये लक्षण दिख रहे हैं?
इलाज के क्या विकल्प हैं, इलाज में कितना समय लगेगा और इसका खर्च कितना होगा?
इलाज से जुड़े जोखिम और फ़ायदे क्या हैं? अगर इलाज में देरी हुई तो क्या होगा?
क्या बच्चे को कोई सावधानी बरतने की ज़रूरत है? क्या बच्चे को फ़ॉलो-अप के तौर पर आँखों की जाँच की ज़रूरत है और अगर हाँ, तो कब?
लक्षण क्या हैं और बच्चे को लक्षण कब से दिखने शुरू हुए?
बच्चे को किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है?
क्या परिवार में आँखों की समस्याओं का कोई इतिहास रहा है?
क्या आपका बच्चा किसी दूसरी बीमारी के लिए कोई दवा ले रहा है?
क्या आपके बच्चे को कभी सिर या आँख में कोई चोट लगी है?